संकष्टी चतुर्थी पर्व जनवरी 2024*विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।नागाननाथ श्रुतियज्ञविभू षिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

संकष्टी चतुर्थी पर्व जनवरी 2024
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं
नागाननाथ श्रुतियज्ञविभू षिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते
सभी सनातनीय पाठकों धर्मावलंबियों को सादर प्रणाम। अवगत कराना चाहूंगी 29 जनवरी 2024 दिन सोमवार को संकट चतुर्थी का उपवास रखा जाएगा। यह उपवास भगवान श्री गणेश को समर्पित है। संकट चौथ का उपवास रखने से व्यक्ति के सभी संकट दूर होते हैं।
संकष्टी का मतलब संकटों का हरण करने वाली चतुर्थी। माताएं अपनी संतान की मंगलकामना,दीर्घायु एवं ऐश्वर्य हेतु इस दिन उपवास रखती हैं। संकष्‍टी व्रत में भगवान गणेश की विशेष पूजा व उपवास रखा जाता है और कथा सुनाई जाती है।


मुहूर्त
चतुर्थी तिथि प्रारंभ 29 जनवरी 2024 प्रातः 6:14 बजे से 30 जनवरी 2024 प्रातः 8:57 बजे तक। चंद्रोदय 29 जनवरी 2024 रात्रि 9:10 बजे पर।
पूजा विधि
नित्य कर्म से निवृत्त होकर संपूर्ण घर में गंगाजल का छिड़काव करें। तत्पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल पर अखंड ज्योत प्रज्वलित करें। गणेशजी की प्रतिमा को ईशान कोण में एक चौकी पर स्‍थापित करें। चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाए। गणेशजी को शुद्ध जल या गंगा जल से स्नान कराएं। स्वयं पर भी गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। गणपतिजी को अक्षत, रोली, कुमकुम, पंच मेवा, पंच मिठाई, पंच फल, पान,सुपारी अर्पित करें। धूप-दीप चढ़ाएं। भगवान गणेश को लाल व पीले पुष्प की माला अर्पित करें। गणेश जी को लड्डू या मोदक का भोग लगाएं। गणेश मंत्र-( ॐ गं गणपतये नमः) का जप करते हुए 108 दूर्वा गणेश जी को अर्पित करें। गणेश जी के इस मंत्र का जप करें –
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्षत्रैलोक्यरक्षकं
भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्
11 घी बत्तियों से गजानन महाराज की आरती करें। चंद्रोदय के उपरांत चंद्र देव को अर्घ देकर व तिल के लड्डू का प्रसाद ग्रहण करें।
व्रत कथा: एक बार देवी पार्वती स्नान हेतु गईं उन्होंने द्वार पर गणेश को खड़ा कर दिया एवं श्री गणेश को आज्ञा दी कि कोई भी भीतर प्रवेश ना करें। भगवान श्री गणेश जी माता की आज्ञा का पालन करते हुए सभी का प्रवेश वर्जित कर दिया। यहां तक कि भगवान गणेश ने अपने पिता शिव को भी अंदर आने से रोक दिया। भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। पुत्र का यह हाल देख मां पार्वती विलाप करने लगीं और अपने पुत्र को जीवित करने का हठ करने लगीं।जब मां पार्वती ने शिव से बहुत अनुरोध किया तो भगवान गणेश को हाथी का सिर लगाकर दूसरा जीवन दिया गया और गणेश गजानन कहलाने लगे। इस दिन से भगवान गणपति की प्रथम पूज्य के रूप में आराधना की जाने लगी। तभी से इस तिथि को संकट चतुर्थी के रूप में पूजा जाने लगा। इस दिन से जो भी माताएं गणेश चतुर्थी का उपवास रखती है उनकी संतति को दीर्घायु प्राप्त होती है।
संकट चतुर्थी पर अपने सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंद व्यक्तियों को अन्न, वस्त्र अवश्य दान करें।
ज्योतिषाचार्य डॉ मंजू जोशी
8395806256

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